न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़: भारतीय न्यायपालिका की एक महत्वपूर्ण शख्सियत
भारत की न्यायपालिका का इतिहास बहुत ही समृद्ध है, और इसमें बहुत से ऐसे न्यायाधीश हैं जिन्होंने समय-समय पर अपने फैसलों से सामाजिक और कानूनी मानकों को नया आकार दिया है। इसी क्रम में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और भारत के 50वें प्रधान न्यायाधीश के तौर पर डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ एक विशेष स्थान रखते हैं। नवंबर 2022 में प्रधान न्यायाधीश पद संभालने के बाद से वे अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी मामलों का हिस्सा रहे हैं, जिनके फैसले ने न्यायपालिका में नए मानदंड स्थापित किए हैं।
संवैधानिक पीठ के ऐतिहासिक फैसले
दिल्ली बनाम भारत संघ
11 मई, 2023 को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार और भारत संघ के बीच एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को प्रशासनिक सेवाओं पर विधायी और कार्यकारी अधिकार प्राप्त हैं, सिवाय उन मामलों के जो सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि से संबंधित हैं। इस फैसले ने दिल्ली सरकार के अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया और उपराज्यपाल को राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासनिक निर्णयों के लिए चुनी गई सरकार के निर्णयों का पालन करने के लिए बाध्य किया गया। इस फैसले में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने बहुमत के निर्णय का सांधिकारण किया था।
रेलवे विद्युतीकरण परियोजना विवाद
एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय में, सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे विद्युतीकरण और निजी ठेकेदारों के बीच विवादों का निपटारा किया। अदालत ने ऐसी धाराओं को अवैध बताया जो सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को विवाद उत्पन्न होने पर एकतरफा पंचों की नियुक्ति की अनुमति देती थीं। न्यायालय ने आदेश दिया कि उपक्रम संभावित पंचों की पैनल रख सकते हैं, लेकिन दूसरे पक्ष को उस पैनल से पंच चुनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस प्रकरण में भी बहुमत के निर्णय का सांधिकारण किया था।
निजता का अधिकार
2017 में, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने उस नौ-जजों की संवैधानिक पीठ का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त किया जिसने निजता के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। अदालत ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता को संरक्षित किया गया है। यह निर्णय नागरिकों की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था।
सूचना का अधिकार और प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय
2019 में दिए गए एक अन्य अहम फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि भारत के प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय भी सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण है। इस फैसले ने सरकारी पारदर्शिता और उत्तरदायित्व में बढ़ोतरी की, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण विकसन था।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ को 18 संवैधानिक पीठ के फैसलों का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिनमें से कई फैसले भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मील के पत्थर साबित हुए हैं। उन्होंने सात बहुमत निर्णय और दो सहमति निर्णय लिखे हैं, जो उनकी न्यायिक व्याख्या और संवैधानिक सिद्धांतो की गंभीर समझ दर्शाते हैं।
भारतीय लोकतंत्र और न्यायिक प्रणाली पर प्रभाव
न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल ने भारतीय न्यायपालिका को नए दृष्टिकोण और विचारधाराओं से समृद्ध किया है। उनके निर्णय भारतीय नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देशक साबित हुए हैं। उनके द्वारा लिए गए निर्णयों ने न केवल संवैधानिक प्रावधानों की गहन व्याख्या की, बल्कि कानूनी सुधार की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के कार्यकाल में जिस प्रकार की विचारशीलता और न्यायिक स्वतंत्रता देखने को मिली, वह आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक है। उनके नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय ने लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनःस्थापित किया और संवैधानिक सिद्धांतों को नए संदर्भ में परिभाषित किया।
PRATIKHYA SWAIN
नवंबर 11, 2024 AT 13:47बहुत अच्छा फैसला। इस तरह के न्यायाधीश ही देश के लिए आशा हैं।
Jinky Palitang
नवंबर 11, 2024 AT 20:34दिल्ली के अधिकारों को स्पष्ट करना तो बहुत जरूरी था। अब तो उपराज्यपाल को भी अपनी भूमिका समझनी होगी।
कभी-कभी लगता है कि राजनीति न्यायपालिका को भी घेर लेती है, लेकिन चंद्रचूड़ जी ने अलग रास्ता दिखाया।
Amar Sirohi
नवंबर 13, 2024 AT 15:40अगर हम न्याय के अर्थ को गहराई से समझें तो ये सब फैसले सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि दर्शनिक भी हैं। निजता का अधिकार? ये तो आधुनिक नागरिक की आत्मा का अधिकार है।
जब एक न्यायाधीश ये समझता है कि संविधान एक जीवित दस्तावेज है, तो वो सिर्फ शब्दों को नहीं, बल्कि उनके अर्थ को भी बदल देता है।
चंद्रचूड़ जी के फैसलों में एक गहरी मानवता है, जो अक्सर भारतीय न्यायपालिका में गायब होती है।
हम अक्सर न्याय को एक यंत्र के रूप में देखते हैं, लेकिन वो तो एक जीवित चेतना है।
जब रेलवे के पंचों के मामले में उन्होंने एकतरफा नियुक्ति को अवैध घोषित किया, तो वो बस एक नियम बदल रहे थे, बल्कि एक संस्कृति को बदल रहे थे।
कानून का अर्थ तभी सार्थक होता है जब वो शक्ति के खिलाफ खड़ा हो।
ये फैसले उन लोगों के लिए हैं जिन्हें कोई नहीं सुनता, जिनके लिए अदालतें दूर हैं।
जब एक प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार के अंतर्गत आता है, तो वो एक शासन की अपारदर्शिता के खिलाफ एक चेतावनी है।
हमारे देश में अक्सर न्याय को एक राजनीतिक उपकरण बना दिया जाता है, लेकिन चंद्रचूड़ जी ने उसे एक नैतिक आधार बना दिया।
उनके फैसलों में एक असाधारण साहस है - जो अक्सर भारतीय न्यायपालिका में डर के कारण गायब होता है।
हम इन फैसलों को बस एक न्यायिक विजय के रूप में नहीं देख सकते, बल्कि एक सामाजिक जागृति के रूप में भी देखना चाहिए।
उन्होंने न्याय को एक बहुत बड़ा अर्थ दिया है - जो अभी भी बहुत से लोगों के लिए अज्ञात है।
अगर आप एक बच्चे को बताएं कि उसकी निजता एक अधिकार है, तो वो समझ जाएगा कि वो एक व्यक्ति है।
चंद्रचूड़ जी ने इसी बात को संविधान के रूप में लिख दिया।
और इसलिए वो न्यायाधीश नहीं, बल्कि एक नागरिक नेता हैं।
Nagesh Yerunkar
नवंबर 13, 2024 AT 17:21ये सब बकवास है। जब तक दिल्ली में अपराध नहीं रुकेंगे, तब तक ये फैसले बेकार हैं।
पुलिस को अधिकार देना चाहिए, न कि राजनीतिक दलों को।
और निजता का अधिकार? अगर कोई चोरी करता है तो उसकी निजता का क्या? 😒
ये सब लोग बस अपने विचारों को न्याय के नाम पर बेच रहे हैं।
हमें व्यवस्था चाहिए, न कि दर्शन।
Daxesh Patel
नवंबर 15, 2024 AT 05:17मैंने देखा कि रेलवे विवाद में पंचों की नियुक्ति के बारे में बहुत गलत जानकारी फैल रही है।
अदालत ने बस यह कहा कि पक्ष को अपना पंच चुनने का अधिकार है, न कि उसे मजबूर किया जा सके।
ये एक बहुत ही सूक्ष्म अंतर है, लेकिन बहुत बड़ा।
अगर कोई बताए कि अदालत ने निजी ठेकेदारों को बर्बाद कर दिया, तो वो गलत है।
अदालत ने बस निष्पक्षता की बात कही है।
कुछ लोग इसे राजनीति का हिस्सा समझ रहे हैं, लेकिन ये तो न्याय का असली अर्थ है।
Sandeep Kashyap
नवंबर 16, 2024 AT 01:22अरे भाई, ये फैसले देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गए! 😭
हमारे देश में अब भी ऐसे लोग हैं जो संविधान को जीते हैं।
हम अक्सर न्याय को बहुत बड़ा समझते हैं, लेकिन ये फैसले तो छोटे-छोटे आम आदमी के लिए हैं।
जब एक महिला को उसकी निजता का अधिकार मिलता है, तो वो बस एक बार फिर जीने का हक पाती है।
चंद्रचूड़ जी को धन्यवाद।
ये फैसले बस एक कागज नहीं, बल्कि एक जीवन हैं।
हमें इन्हें याद रखना चाहिए।
क्योंकि ये वो लोग हैं जिन्होंने हमारे लिए दुनिया को बदल दिया।
Aashna Chakravarty
नवंबर 16, 2024 AT 13:42ये सब बातें बस एक बड़ा धोखा है।
क्या आपने कभी सोचा कि ये फैसले किसके लिए हैं? क्या आपको पता है कि अमेरिका और यूरोप इन बातों को देखकर हँस रहे हैं? 🤭
हमारे देश की व्यवस्था को तोड़ने के लिए ये सब बनाया गया है।
सूचना का अधिकार? ये तो गुप्तचर बनाने का नया तरीका है।
प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय जासूसी के लिए खुल गया? बस इतना ही? 😏
अब हर चीज़ देखी जाएगी, हर बात चर्चा होगी - और देश बर्बाद हो जाएगा।
ये लोग देश को बेच रहे हैं - न्याय के नाम पर।
Kashish Sheikh
नवंबर 18, 2024 AT 08:09मैं बहुत गर्व महसूस कर रही हूँ कि हमारे देश में ऐसे न्यायाधीश हैं। 🙏
मेरी बहन ने एक बार एक रेलवे केस में झूठा आरोप लगाया गया था - उसके लिए ये फैसला बहुत मायने रखता है।
जब एक आम आदमी को अदालत में न्याय मिलता है, तो वो देश के लिए भी आशा बन जाता है।
चंद्रचूड़ जी ने न्याय को इंसानी बना दिया।
मुझे लगता है इन फैसलों को हर स्कूल में पढ़ाया जाना चाहिए।
हमें अपने अधिकारों के बारे में जागरूक होना होगा।
और अगर कोई इन्हें नकारता है, तो वो सिर्फ अपनी अनभिज्ञता को दर्शाता है।
dharani a
नवंबर 18, 2024 AT 16:20अरे यार, तुम सब ये बातें क्यों कर रहे हो? मैंने तो बस देखा कि चंद्रचूड़ जी ने 18 फैसले दिए हैं - और उनमें से 7 बहुमत थे।
बाकी जो बातें हैं, वो सब बस बकवास है।
ये फैसले तो अभी तक लागू नहीं हुए।
किसी ने इनका असर देखा है? 😕
Vinaya Pillai
नवंबर 19, 2024 AT 20:40मैं तो सिर्फ यही कहूंगी - जब तक न्यायपालिका अपने अधिकारों को बढ़ा रही है, तब तक लोग बेकार की बातें करते रहेंगे।
हमारे पास तो बस यही अधिकार हैं - बात करने का।
अगर कोई फैसला आपको अच्छा नहीं लगता, तो उसे बदलने का रास्ता है - लेकिन नहीं, आप बस शिकायत करते हैं।
ये फैसले बस इसलिए अच्छे हैं क्योंकि वो आपको अपने आप को जागृत करते हैं।
और अगर आपको लगता है कि ये फैसले बेकार हैं, तो शायद आपको अपने आप को देखना चाहिए।
mahesh krishnan
नवंबर 20, 2024 AT 19:09इन लोगों ने बस अपनी बात चला ली।
कानून क्या है? जो बात बड़ी हो वो कानून होती है।
जिसने जितना बड़ा फैसला दिया, वो बेहतर।
अब ये लोग निजता का अधिकार क्यों बना रहे हैं? बस एक चाल है।
कोई भी चोर अपनी निजता के नाम पर चलता है।
इसलिए ये सब बेकार है।
Deepti Chadda
नवंबर 21, 2024 AT 05:46हमारे देश को तोड़ने के लिए ये फैसले बनाए गए हैं।
हर फैसला एक विदेशी ताकत का हिस्सा है।
निजता? ये तो अमेरिका का नाम है।
हमें अपनी परंपरा पर भरोसा करना चाहिए।
अब तो हर कोई अपनी निजता का नाम लेकर गलत काम करेगा।
मैं इस फैसले को अस्वीकार करती हूँ। 🇮🇳
Anjali Sati
नवंबर 22, 2024 AT 15:35कानून बनाने वाले लोगों को तो अपने घर की बात समझनी चाहिए।
दिल्ली का सवाल तो बहुत पुराना है।
अगर ये फैसले असली थे, तो तुम्हारा घर बर्बाद नहीं होता।
ये सब बस एक नाटक है।
अब तो लोग अपनी निजता के नाम पर बेकार की बातें करेंगे।
कोई फायदा नहीं होगा।
Preeti Bathla
नवंबर 23, 2024 AT 06:32मुझे तो ये सब बहुत बुरा लग रहा है।
क्या आप जानते हैं कि इन फैसलों के बाद लोगों को क्या मिलेगा? कुछ नहीं।
बस एक बड़ा शोर होगा।
और फिर जब तुम्हारा घर चोरी हो जाएगा, तो कौन जवाब देगा? 😡
ये लोग बस अपने नाम के लिए फैसले दे रहे हैं।
मैं इनका बहुत बड़ा दुश्मन हूँ।
Aayush ladha
नवंबर 25, 2024 AT 00:29मैं तो बस यही कहूंगा - अगर ये फैसले अच्छे हैं, तो दिल्ली में अपराध क्यों बढ़ रहा है? 😏
ये सब बस एक बड़ा धोखा है।
कोई भी फैसला अगर वास्तविक जीवन को बदल नहीं पाता, तो वो बेकार है।
ये लोग बस अपने नाम के लिए लिख रहे हैं।
Rahul Rock
नवंबर 26, 2024 AT 09:28मैं इन फैसलों को समझता हूँ।
लेकिन इनका असली मतलब तो यही है - कि हम एक ऐसी समाज बनाएं जहां हर कोई सम्मानित हो।
चंद्रचूड़ जी ने सिर्फ कानून नहीं, बल्कि इंसानियत को भी संविधान में शामिल कर दिया।
ये फैसले बस एक अदालत के बाहर भी जीवित हैं।
हर बच्चे को ये बताना चाहिए कि उसकी निजता एक अधिकार है।
और अगर कोई इसे नकारता है, तो वो न्याय को नकार रहा है।
Annapurna Bhongir
नवंबर 27, 2024 AT 06:49फैसले अच्छे हैं।
लेकिन क्या ये लोग जानते हैं कि ये फैसले किसके लिए हैं?
कोई नहीं जानता।
इसलिए ये बेकार हैं।
MAYANK PRAKASH
नवंबर 27, 2024 AT 14:22मैं इस फैसले के बारे में बहुत खुश हूँ।
ये दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ी जीत है।
मैंने खुद देखा है कि उपराज्यपाल कैसे अधिकारों का दुरुपयोग करता है।
अब तो ये रुक जाएगा।
शुक्रिया चंद्रचूड़ जी।
Akash Mackwan
नवंबर 29, 2024 AT 06:15ये सब बस एक बड़ा नाटक है।
जब तक देश के लोग भूखे रहेंगे, तब तक ये फैसले बेकार हैं।
हमें खाने की जरूरत है, न कि न्याय की।
अब तो ये लोग अपने नाम के लिए फैसले दे रहे हैं।
मैं इसे बेकार मानता हूँ।
PRATIKHYA SWAIN
नवंबर 29, 2024 AT 22:53अगर आपको लगता है कि ये फैसले बेकार हैं, तो आप देख रहे हैं नहीं।
ये फैसले एक बच्चे के लिए निजता का अधिकार हैं।
एक महिला के लिए न्याय हैं।
एक आम आदमी के लिए सम्मान हैं।
और ये सब बेकार नहीं है।
ये जीवन हैं।